बस्तर की पहचान पर बड़ा सवाल: GI टैग की दौड़ में अटकी विरासत, 14 आवेदन अभी भी इंतजार में
बस्तर की असली ताकत सिर्फ उसके घने जंगलों या प्राकृतिक संपदा में नहीं है। यहां की मिट्टी, जंगल से मिलने वाली उपज, पारंपरिक कारीगरी और पीढ़ियों से चली आ रही तकनीकें अपने आप में ऐसी पहचान हैं, जिन्हें बाजार में अलग मूल्य मिल सकता है। लेकिन इस पहचान को कानूनी और व्यावसायिक सुरक्षा देने वाली Bastar GI Tag प्रक्रिया अभी भी कई उत्पादों के लिए अधूरी तस्वीर बनी हुई है।
बस्तर की ढोकरा, लौह और काष्ठ कला को पहले ही भौगोलिक संकेत की पहचान मिल चुकी है। आधिकारिक GI रिकॉर्ड में Bastar Iron Craft और Bastar Dhokra वर्ष 2008 में तथा Bastar Wooden Craft वर्ष 2008 में पंजीकृत दर्ज हैं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। आज भी बस्तर से जुड़े कई कृषि और हस्तशिल्प उत्पाद GI प्रक्रिया में हैं। मसलन, Bastar Stone Craft और Bastar Terracotta के आवेदन अभी “Examination” चरण में दर्ज हैं। Bastar Tamarind का आवेदन भी आधिकारिक पोर्टल पर Examination स्थिति में दिखाई देता है।
GI टैग सिर्फ एक प्रमाणपत्र नहीं, बाजार की पहचान है
GI यानी Geographical Indication किसी ऐसे उत्पाद की भौगोलिक पहचान को मान्यता देता है, जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशिष्ट विशेषता उसके क्षेत्र से जुड़ी होती है। यही वजह है कि किसी पारंपरिक उत्पाद के लिए GI मिलना केवल सरकारी सूची में नाम जुड़ने भर की घटना नहीं है।
इसके तीन बड़े आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं—उत्पाद की विशिष्ट पहचान, नकली या गलत भौगोलिक दावे के खिलाफ बेहतर सुरक्षा और बाजार में ब्रांड वैल्यू बनाने की संभावना।
हालांकि यहां एक जरूरी सावधानी भी है। GI टैग अपने आप किसी उत्पाद की कीमत नहीं बढ़ाता। वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब पंजीकरण के बाद उत्पाद की गुणवत्ता, प्रमाणित उत्पादकों की व्यवस्था, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, बाजार संपर्क और उपभोक्ता जागरूकता पर भी काम किया जाए।
बस्तर के उत्पादों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
बस्तर की हल्दी, इमली, तिखूर, सीताफल, कोदो-कुटकी और पारंपरिक वस्त्रों जैसे उत्पादों की पहचान स्थानीय स्तर पर मजबूत हो सकती है, लेकिन GI आवेदन के लिए सिर्फ यह साबित करना पर्याप्त नहीं होता कि कोई उत्पाद लंबे समय से किसी क्षेत्र में बनाया या उगाया जा रहा है।
आवेदन के साथ उत्पाद की विशिष्टता, भौगोलिक क्षेत्र, पारंपरिक उत्पादन पद्धति, ऐतिहासिक प्रमाण और स्थानीय उत्पादकों से संबंधित दस्तावेजों की जरूरत पड़ती है। आधिकारिक GI आवेदन रिकॉर्ड में भी उत्पाद के इतिहास, भौगोलिक क्षेत्र, उत्पादन पद्धति और विशिष्टता से संबंधित दस्तावेज शामिल दिखाई देते हैं।
यही वह जगह है जहां संस्थागत सहयोग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
कागज से बाजार तक पहुंचना होगा
बस्तर में GI की संभावनाओं पर चर्चा अक्सर आवेदन और पंजीकरण तक सीमित रह जाती है। असली चुनौती इसके बाद शुरू होती है।
मान लीजिए किसी स्थानीय उत्पाद को GI मिल भी जाता है। यदि किसान या कारीगर अपने उत्पाद को प्रमाणित तरीके से बेच नहीं पाता, डिजिटल बाजार तक नहीं पहुंच पाता या खरीदार को GI की अहमियत समझ नहीं आती, तो प्रमाणपत्र का आर्थिक लाभ सीमित रह जाएगा।
इसलिए विश्वविद्यालयों, सहकारी संस्थाओं, उत्पादक कंपनियों, स्वयं सहायता समूहों और सरकारी विभागों के बीच एक स्थायी व्यवस्था बनाना जरूरी है।
बस्तर के कलाकारों को डिजाइन विशेषज्ञों, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और आधुनिक पैकेजिंग से जोड़ने की दिशा में पहल इसी अंतर को कम कर सकती है। विश्वविद्यालय स्तर पर दस्तावेजीकरण और बाजार संपर्क में सहयोग की योजनाएं इस प्रक्रिया को मजबूत कर सकती हैं।
दूसरे राज्यों से तुलना का असली मतलब
राज्यवार GI संख्या की तुलना करते समय आंकड़ों को सावधानी से पढ़ना जरूरी है। आधिकारिक GI रिकॉर्ड में मुख्य उत्पादों के साथ लोगो और अलग आवेदन भी दिखाई देते हैं, इसलिए अलग-अलग रिपोर्टों में कुल संख्या अलग मिल सकती है। उदाहरण के तौर पर Bastar Dhokra का मूल GI पंजीकरण अलग है और उसका लोगो भी अलग आवेदन के रूप में दर्ज है।
इसलिए केवल “कितने GI टैग” की संख्या से किसी राज्य की पूरी स्थिति नहीं समझी जा सकती। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कितने स्थानीय उत्पाद आवेदन की स्थिति में हैं, कितनों को पंजीकरण मिला है और पंजीकरण के बाद उत्पादकों को उसका वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिल रहा है।
नए आवेदन उम्मीद भी दिखाते हैं
तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। आधिकारिक GI पोर्टल पर बस्तर और छत्तीसगढ़ से जुड़े नए आवेदन भी लगातार दिखाई दे रहे हैं।
Bastar Stone Craft और Bastar Terracotta के आवेदन 2024 में दाखिल हुए और दोनों अभी Examination चरण में हैं। Bastar Tamarind का आवेदन दिसंबर 2024 में दाखिल हुआ और वह भी Examination स्थिति में दर्ज है। इसके अलावा Chirainakhi और Kanker Custard Apple जैसे कृषि उत्पादों के आवेदन भी आधिकारिक रिकॉर्ड में Examination चरण में दिखाई देते हैं।
इससे यह संकेत मिलता है कि स्थानीय उत्पादों को GI पहचान दिलाने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन कई मामलों में अंतिम पंजीकरण तक पहुंचने में समय लग रहा है।
आगे की रणनीति कैसी होनी चाहिए?
बस्तर की GI रणनीति को केवल आवेदन कराने की बजाय एक व्यापक “स्थानीय उत्पाद से वैश्विक बाजार” मॉडल से जोड़ना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
इसके लिए पांच स्तरों पर काम जरूरी है—
- पारंपरिक उत्पादों का वैज्ञानिक और डिजिटल दस्तावेजीकरण।
- GI आवेदन के लिए विशेषज्ञ कानूनी और तकनीकी सहायता।
- किसानों और कारीगरों को प्रमाणित उत्पादक समूहों से जोड़ना।
- GI उत्पादों के लिए आधुनिक ब्रांडिंग, पैकेजिंग और ई-कॉमर्स नेटवर्क तैयार करना।
- GI मिलने के बाद नकली उत्पादों और गलत भौगोलिक दावों की निगरानी।
अगर ऐसा मॉडल तैयार होता है, तो GI सिर्फ सरकारी प्रमाणपत्र नहीं रहेगा, बल्कि बस्तर के ग्रामीण परिवारों, कारीगरों और छोटे उत्पादकों के लिए आय का अतिरिक्त माध्यम बन सकता है।
बस्तर की विरासत को पहचान से आगे आर्थिक ताकत बनाना होगा
बस्तर के पास उत्पादों की कमी नहीं है। चुनौती उनकी पहचान को औपचारिक रूप देने, उसे सुरक्षित रखने और फिर बाजार में उसका मूल्य पैदा करने की है।
आधिकारिक रिकॉर्ड यह भी दिखाता है कि क्षेत्र के कुछ पारंपरिक शिल्प पहले ही GI व्यवस्था में जगह बना चुके हैं, जबकि नए शिल्प और कृषि उत्पादों के आवेदन अभी प्रक्रिया में हैं।



