राजकोषीय घाटे का बढ़ता दबाव: 5 महीने में ₹7.10 लाख करोड़, सब्सिडी और Capex ने बढ़ाई चुनौती
भारत सरकार के खजाने पर वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती पांच महीनों में दबाव बढ़ा है। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच केंद्र का राजकोषीय घाटा ₹7.10 लाख करोड़ तक पहुंच गया। यह पूरे वित्त वर्ष के लिए तय ₹16.96 लाख करोड़ के लक्ष्य का करीब 42% है।
पहली नजर में यह आंकड़ा चिंता बढ़ाने वाला लग सकता है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। घाटे में बढ़ोतरी के पीछे केवल सरकारी खर्च का बढ़ना नहीं है। खाद्य और यूरिया सब्सिडी पर ज्यादा खर्च के साथ-साथ सरकार ने पूंजीगत खर्च की रफ्तार भी कायम रखी है।
यानी सरकार के सामने इस समय दोहरी चुनौती है—एक तरफ लोगों और कृषि क्षेत्र से जुड़ी सब्सिडी का खर्च संभालना और दूसरी तरफ सड़क, रेलवे, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी अर्थव्यवस्था की क्षमता बढ़ाने वाली परियोजनाओं पर पैसा लगाना।
पांच महीने में लक्ष्य का 42% हिस्सा खर्च
अप्रैल-अगस्त के दौरान राजकोषीय घाटा ₹7.10 लाख करोड़ रहा। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में घाटा पूरे साल के बजट अनुमान का करीब 38% था।
इस बार अनुपात बढ़कर लगभग 42% हो गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार पूरे साल का बजट लक्ष्य निश्चित रूप से पार कर देगी। राजस्व और खर्च दोनों पूरे साल एक समान गति से नहीं चलते। इसलिए वित्त वर्ष के बाकी महीनों में टैक्स कलेक्शन, विनिवेश, गैर-कर राजस्व और सरकारी खर्च की गति महत्वपूर्ण होगी।
फिर भी शुरुआती पांच महीनों का आंकड़ा यह संकेत देता है कि सरकार के राजकोषीय प्रबंधन पर नजर रखना जरूरी होगा।
असली दबाव सब्सिडी बिल से आया
राजकोषीय घाटे के बढ़ने में सब्सिडी खर्च की भूमिका इस बार खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
अप्रैल-अगस्त के बीच प्रमुख सब्सिडी पर सरकार का खर्च करीब ₹1.87 लाख करोड़ रहा, जो एक साल पहले इसी अवधि के ₹1.50 लाख करोड़ से लगभग 24.4% अधिक है।
पूरे वित्त वर्ष के लिए सब्सिडी का बजट अनुमान ₹4.11 लाख करोड़ है। यानी पांच महीने में ही इसका करीब 46% खर्च हो चुका है।
यहां सबसे बड़ा योगदान दो मदों का है—खाद्य सब्सिडी और यूरिया सब्सिडी।
खाद्य सब्सिडी में करीब 30% की छलांग
अप्रैल से अगस्त के बीच खाद्य सब्सिडी पर खर्च लगभग 30% बढ़कर ₹83,510 करोड़ हो गया। पिछले साल इसी अवधि में यह ₹64,408 करोड़ था।
सरकार ने पूरे वित्त वर्ष के लिए खाद्य सब्सिडी पर करीब ₹2.28 लाख करोड़ का प्रावधान किया है। इस लिहाज से पांच महीनों में बजट का लगभग 37% हिस्सा खर्च हो चुका है।
खाद्य सब्सिडी का बढ़ना केवल सरकारी खातों का मामला नहीं है। इसका संबंध खाद्य सुरक्षा व्यवस्था और आम उपभोक्ताओं तक सस्ती खाद्यान्न आपूर्ति बनाए रखने से भी है। इसलिए इस मद में खर्च घटाना सरकार के लिए केवल वित्तीय फैसला नहीं होगा, बल्कि इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी हो सकते हैं।
यूरिया सब्सिडी ने बढ़ाई चिंता
यूरिया सब्सिडी का आंकड़ा भी सरकार के खर्च पर बढ़ते दबाव को दिखाता है।
अप्रैल-अगस्त के बीच यूरिया सब्सिडी पर खर्च सालाना आधार पर करीब 27.9% बढ़कर ₹77,522 करोड़ हो गया। पिछले साल इसी अवधि में यह ₹60,622 करोड़ था।
पूरे वित्त वर्ष के लिए यूरिया सब्सिडी का बजट करीब ₹1.17 लाख करोड़ है। इसमें से लगभग 66% राशि शुरुआती पांच महीनों में ही खर्च हो चुकी है।
अगर आने वाले महीनों में यही रफ्तार बनी रहती है, तो सरकार को इस मद में बजट प्रावधान और वास्तविक जरूरत के बीच संतुलन साधना पड़ सकता है।
लेकिन Capex को रोकने का संकेत नहीं
राजकोषीय आंकड़ों की सबसे अहम बात यह है कि सरकार ने खर्च नियंत्रित करने के लिए पूंजीगत व्यय की रफ्तार को कमजोर नहीं किया है।
अप्रैल-अगस्त में कैपिटल एक्सपेंडिचर पूरे साल के बजट अनुमान का करीब 42% रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 39% था।
यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि पूंजीगत खर्च को आमतौर पर सड़क, रेलवे, बंदरगाह, इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण से जोड़ा जाता है। ऐसे खर्च का असर तत्काल राजस्व की तरह दिखाई नहीं देता, लेकिन लंबे समय में अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता और निजी निवेश के माहौल पर प्रभाव पड़ सकता है।
यही वजह है कि सरकार के सामने सिर्फ घाटा कम करने का सवाल नहीं है। उसे यह भी तय करना है कि किस तरह का खर्च आर्थिक गतिविधि को आगे बढ़ा सकता है।
सरकार की उधारी भी महत्वपूर्ण संकेत
घाटे की भरपाई के लिए सरकार को बाजार से उधार लेना पड़ता है। अप्रैल-अगस्त तक बाजार से लिए गए कर्ज की राशि करीब ₹5.30 लाख करोड़ रही।
यह 2026-27 के लिए निर्धारित ₹13.03 लाख करोड़ के बाजार उधारी अनुमान का लगभग 41% है। पिछले साल इसी अवधि में यह अनुपात करीब 37% था।
सरकारी उधारी बढ़ने का असर व्यापक वित्तीय बाजार पर पड़ सकता है। बड़ी सरकारी उधारी से बॉन्ड बाजार में मांग-आपूर्ति का समीकरण बदल सकता है और ब्याज दरों पर भी दबाव बन सकता है। हालांकि वास्तविक असर उस समय की मौद्रिक नीति, बैंकिंग सिस्टम की तरलता और निजी क्षेत्र की कर्ज मांग समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।
आगे सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
आने वाले महीनों में सरकार की निगाह तीन चीजों पर रहेगी—राजस्व संग्रह, सब्सिडी का खर्च और पूंजीगत व्यय की गति।
यदि टैक्स से राजस्व मजबूत रहता है और आर्थिक गतिविधियां उम्मीद के मुताबिक बनी रहती हैं, तो शुरुआती घाटे का अनुपात पूरे साल की तस्वीर को जरूरी नहीं कि खराब बनाए। लेकिन अगर सब्सिडी का खर्च अनुमान से तेजी से बढ़ता है और राजस्व में अपेक्षित मजबूती नहीं आती, तो राजकोषीय संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार इस समय खर्च में कटौती के बजाय उसके स्वरूप को लेकर रणनीति अपना रही है। सब्सिडी लोगों और कृषि क्षेत्र की तत्काल जरूरतों को पूरा करती है, जबकि Capex भविष्य की आर्थिक क्षमता तैयार करने पर केंद्रित है।



