नई दिल्ली। मुंह के सबसे पीछे आने वाली आखिरी दाढ़ को लेकर एक आम धारणा है कि यह दांत उम्र के साथ आने वाली समझदारी का संकेत है। इसी वजह से भारत समेत दक्षिण एशिया में इसे अक्ल दाढ़ कहा जाता है। अंग्रेजी में इसका नाम Wisdom Tooth और चिकित्सा विज्ञान में Third Molar है।
लेकिन इस दांत की कहानी नाम से कहीं ज्यादा दिलचस्प है। यह दांत हर व्यक्ति में मौजूद हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कई लोगों में यह कभी दिखाई ही नहीं देता, जबकि कुछ लोगों में इसके निकलने की प्रक्रिया दर्द, सूजन और दूसरे दांतों से जुड़ी परेशानियां पैदा कर सकती है।
17 से 25 साल के बीच क्यों आती है अक्ल दाढ़?

अक्ल दाढ़ आमतौर पर वयस्कता की शुरुआत के आसपास निकलती है। अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन के अनुसार, इसका निकलना अक्सर 17 से 21 वर्ष के बीच शुरू होता है, जबकि ब्रिटेन की NHS के मुताबिक यह किशोरावस्था के आखिरी वर्षों से लेकर करीब 25 साल की उम्र तक दिखाई दे सकती है।
इसका मतलब यह नहीं कि 25 वर्ष की उम्र के बाद अक्ल दाढ़ नहीं निकल सकती। दांतों के विकास का समय व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग हो सकता है।
आम तौर पर एक वयस्क के 32 दांत होते हैं। इनमें चार तीसरी दाढ़ें हो सकती हैं—ऊपरी और निचले जबड़े के दोनों सिरों पर एक-एक। लेकिन किसी व्यक्ति में चारों हों, यह जरूरी नहीं। कुछ लोगों में एक, दो या तीन अक्ल दाढ़ें होती हैं और कुछ में एक भी नहीं होती।
क्या अक्ल दाढ़ का न निकलना असामान्य है?

नहीं। यह अपने आप में बीमारी या कमी का संकेत नहीं माना जाता।
आनुवंशिक कारणों और जबड़े की संरचना समेत कई कारक यह तय कर सकते हैं कि तीसरी दाढ़ विकसित होगी या नहीं। कई लोगों में दांत हड्डी या मसूड़े के भीतर ही रह जाता है और जीवनभर कोई परेशानी नहीं देता।
इसलिए केवल इसलिए कि किसी व्यक्ति की अक्ल दाढ़ नहीं निकली, उसे दंत समस्या मान लेना सही नहीं है।
हमारे पूर्वजों के लिए यह दांत ज्यादा उपयोगी क्यों था?
अक्ल दाढ़ को समझने के लिए मानव विकास को देखना जरूरी है।
क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, मानव पूर्वजों के भोजन में कच्चे पौधे, सूखे फल और सख्त या रेशेदार मांस जैसी चीजें अधिक शामिल थीं। ऐसे भोजन को चबाने के लिए अतिरिक्त मजबूत दाढ़ उपयोगी हो सकती थी।
समय के साथ भोजन तैयार करने के तरीके बदले। पकाने और काटने जैसे तरीकों ने कठोर भोजन को चबाने की जरूरत कम की। मानव जबड़े की संरचना में भी विकासवादी बदलाव आए और कई लोगों में पीछे की तीसरी दाढ़ के लिए पर्याप्त जगह नहीं बचती।
यहीं से आधुनिक इंसान के लिए अक्ल दाढ़ एक उपयोगी दांत होने के साथ-साथ संभावित परेशानी का कारण भी बन गई।
सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब दांत को जगह नहीं मिलती
अक्ल दाढ़ का होना अपने आप में समस्या नहीं है। असली सवाल है कि वह किस दिशा और किस स्थिति में विकसित हो रही है।
अगर दांत सही कोण पर निकल आए और उसकी सफाई आसानी से हो सके, तो उसे हमेशा निकालना जरूरी नहीं होता। लेकिन जब जबड़े में जगह कम हो तो दांत आधा निकल सकता है, टेढ़ा बढ़ सकता है या मसूड़े के अंदर फंसा रह सकता है।
ऐसी स्थिति में भोजन और बैक्टीरिया फंसने की संभावना बढ़ सकती है। इससे मसूड़ों में सूजन, दर्द, संक्रमण या आसपास के दांतों को नुकसान जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
क्या हर अक्ल दाढ़ निकलवा देनी चाहिए?
नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
केवल इसलिए कि अक्ल दाढ़ मौजूद है, उसे सर्जरी से निकालना जरूरी नहीं माना जाता। अगर दांत स्वस्थ है, सही तरीके से निकला है और उसकी सफाई संभव है, तो दंत चिकित्सक उसकी नियमित निगरानी की सलाह दे सकते हैं।
दूसरी ओर, अगर दांत बार-बार संक्रमण पैदा कर रहा है, लगातार दर्द हो रहा है, पड़ोसी दांत को नुकसान पहुंच रहा है या वह ऐसी स्थिति में फंसा है जहां भविष्य में गंभीर समस्या की आशंका है, तो डेंटिस्ट उसे निकालने की सलाह दे सकते हैं।
इसका फैसला व्यक्ति की जांच और जरूरत पड़ने पर डेंटल एक्स-रे के आधार पर किया जाता है।
दर्द हो तो इसे सिर्फ ‘अक्ल दाढ़ निकल रही है’ मानना ठीक नहीं
पीछे के हिस्से में दर्द होने पर लोग अक्सर इसे सामान्य रूप से दांत निकलने की प्रक्रिया समझ लेते हैं। लेकिन दर्द के पीछे संक्रमण या दांत के फंसने जैसी दूसरी वजह भी हो सकती है।
अगर दर्द लगातार बना रहे, मसूड़े में ज्यादा सूजन हो, मुंह खोलने में परेशानी हो या बुखार जैसे लक्षण दिखाई दें, तो दंत चिकित्सक से जांच कराना बेहतर है।
खास बात यह है कि अक्ल दाढ़ का निकलना और उसे निकलवाना दो अलग बातें हैं। हर व्यक्ति के लिए उपचार की जरूरत समान नहीं होती।
आगे की जिंदगी में क्या असर पड़ सकता है?
आज किसी अक्ल दाढ़ से कोई परेशानी नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि भविष्य में निश्चित रूप से समस्या होगी, और न ही यह मानना सही है कि समस्या जरूर पैदा होगी।
इसीलिए नियमित डेंटल चेकअप महत्वपूर्ण है। दांत की स्थिति, आसपास की सफाई और जबड़े में उपलब्ध जगह को देखकर डॉक्टर यह तय कर सकते हैं कि केवल निगरानी पर्याप्त है या उपचार की जरूरत है।
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