नई दिल्ली। भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि देश की आर्थिक वृद्धि के सामने सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र के निवेश की कमी है। उनका मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियादी ढांचे और सरकारी पूंजीगत व्यय के सहारे आगे बढ़ रही है, लेकिन दीर्घकालिक विकास के लिए निजी निवेश में तेजी आना जरूरी है।
भल्ला ने कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव का असर मुख्य रूप से तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा चुनौतियां घरेलू स्तर पर अधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि निजी कंपनियों द्वारा नए निवेश और रोजगार सृजन में वृद्धि से ही आर्थिक विकास को और गति मिल सकती है। इसके साथ ही उन्होंने उपभोक्ता मांग और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
अर्थशास्त्री के अनुसार, भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। हालांकि आने वाले वर्षों में उच्च विकास दर बनाए रखने के लिए निवेश, उत्पादकता और रोजगार के क्षेत्र में निरंतर सुधार आवश्यक होगा। भल्ला की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक बाजार पश्चिम एशिया की स्थिति और उसके आर्थिक प्रभावों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।





