घरेलू हिंसा के बढ़ते मामलों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि देश में साक्षरता दर बढ़ी है और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं, लेकिन इसके बावजूद घरेलू हिंसा के मामलों में कमी नहीं आ रही है। कोर्ट ने इसे “रोगग्रस्त सामाजिक व्यवस्था” का संकेत बताते हुए कहा कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि मानसिकता में बदलाव जरूरी है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जागरूकता अभियान, महिला हेल्पलाइन और सुरक्षा से जुड़े कई कदम उठाए गए हैं, फिर भी बड़ी संख्या में महिलाएं हिंसा का सामना कर रही हैं। कोर्ट ने राज्यों और संबंधित एजेंसियों से पूछा कि कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और पीड़ितों को त्वरित सहायता देने के लिए और क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में घरेलू हिंसा सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से जुड़ी जटिल समस्या है। अदालत की सख्त टिप्पणी ने इस मुद्दे पर नई बहस छेड़ दी है और उम्मीद जताई जा रही है कि इससे नीतियों और जमीनी स्तर पर कार्रवाई को और मजबूती मिलेगी।


