दुनियाभर में दुर्लभ बीमारियां एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही हैं। वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक करीब 30 करोड़ लोग किसी न किसी दुर्लभ रोग से पीड़ित हैं, जबकि अब तक 10 हजार से अधिक अलग-अलग दुर्लभ बीमारियों की पहचान हो चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन रोगों में से अधिकांश आनुवंशिक (जेनेटिक) होते हैं और बचपन में ही उनके लक्षण सामने आने लगते हैं, जिससे मरीजों और उनके परिवारों को लंबे समय तक इलाज और देखभाल की जरूरत पड़ती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, दुर्लभ बीमारियों का सबसे बड़ा संकट समय पर सही निदान (डायग्नोसिस) न हो पाना है। कई मरीज वर्षों तक बीमारी की पहचान के लिए भटकते रहते हैं। इसके अलावा, इन रोगों के इलाज के लिए विकसित दवाएं और थेरेपी बेहद महंगी होती हैं, जिनकी लागत करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है। यही वजह है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में मरीजों के लिए उपचार कराना बड़ी चुनौती बन जाता है।
सरकारें और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन दुर्लभ बीमारियों पर शोध, जागरूकता और सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जीन थेरेपी और उन्नत बायोटेक्नोलॉजी भविष्य में इलाज के नए रास्ते खोल सकती हैं, लेकिन इसके लिए नीतिगत समर्थन और वित्तीय सहायता बेहद जरूरी होगी।


