लगातार बढ़ता वायु प्रदूषण अब सिर्फ फेफड़ों और दिल की बीमारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह हमारी याददाश्त पर भी गंभीर असर डाल रहा है। हालिया शोधों में सामने आया है कि प्रदूषित हवा में लंबे समय तक रहने वाले लोगों में डिमेंशिया का खतरा करीब 40% तक बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार हवा में मौजूद सूक्ष्म कण (PM2.5) सीधे रक्त प्रवाह के जरिए मस्तिष्क तक पहुंचकर कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार प्रदूषण के संपर्क में रहने से दिमाग में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और न्यूरॉन क्षति जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। यह स्थिति उम्र बढ़ने के साथ और गंभीर हो सकती है, खासकर बुजुर्गों में। बच्चों और युवाओं में भी संज्ञानात्मक क्षमता पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। इसलिए वायु गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखना केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य का भी अहम मुद्दा बन गया है।
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डॉक्टरों ने सलाह दी है कि लोग अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकलने से बचें, मास्क का उपयोग करें और घर के अंदर एयर प्यूरीफायर जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करें। साथ ही, नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और मानसिक गतिविधियां दिमाग को स्वस्थ रखने में मददगार साबित हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण नियंत्रण के ठोस कदम ही आने वाली पीढ़ियों की यादों को सुरक्षित रख सकते हैं।


