वैश्विक जलवायु संकट के बीच 28 साल बाद भी Kyoto Protocol की प्रासंगिकता बरकरार है। 1997 में अपनाया गया यह अंतरराष्ट्रीय समझौता पहली बार विकसित देशों पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती की कानूनी बाध्यता लेकर आया था। इसने जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक जिम्मेदारी का विषय बना दिया। क्योटो प्रोटोकॉल ने “कॉमन बट डिफरेंशिएटेड रिस्पॉन्सिबिलिटी” के सिद्धांत को मजबूत किया, जिसके तहत ऐतिहासिक उत्सर्जन के आधार पर देशों की जवाबदेही तय की गई।
हालांकि समय के साथ इसकी सीमाएं भी सामने आईं, लेकिन इसने कार्बन मार्केट, क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (CDM) और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नींव रखी। बाद में हुए पेरिस समझौते के लिए भी यह एक आधार बना। विशेषज्ञों का मानना है कि आज जब जलवायु संकट और गंभीर हो चुका है, तब क्योटो प्रोटोकॉल की भावना—जिम्मेदारी, पारदर्शिता और वैश्विक साझेदारी—पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।


