नई दिल्ली। देश में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति जनवरी में बढ़कर 1.81 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जबकि दिसंबर में यह 0.83 प्रतिशत दर्ज की गई थी। ताजा आंकड़ों के अनुसार, खाद्य पदार्थों, विनिर्मित उत्पादों और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण थोक महंगाई दर में यह उछाल देखने को मिला है। लगातार दूसरे महीने बढ़ोतरी ने बाजार और नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सब्जियों, दालों और कुछ आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी ने महंगाई पर दबाव बनाया है। साथ ही वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भी थोक कीमतों पर पड़ा है। हालांकि खुदरा मुद्रास्फीति और थोक महंगाई के रुझानों में अंतर बना हुआ है, लेकिन आने वाले महीनों में इसका असर उपभोक्ता कीमतों पर भी पड़ सकता है।
आर्थिक जानकारों के मुताबिक, यदि कच्चे माल और ईंधन की लागत ऊंची बनी रहती है तो उद्योगों पर लागत का दबाव बढ़ेगा। ऐसे में मौद्रिक नीति पर भी नजर रहेगी कि महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं। फिलहाल जनवरी के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि महंगाई का दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।


