नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन को लेकर युवाओं में चिंता और आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। हालिया सर्वे के मुताबिक 94 प्रतिशत युवा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं और मानते हैं कि जलवायु संकट उनके जीवन, रोजगार और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश, सूखा और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु संकट अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक स्थिरता से भी जुड़ चुका है। युवाओं का एक बड़ा वर्ग सरकारों और वैश्विक संस्थाओं से ठोस और त्वरित कदम उठाने की मांग कर रहा है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक अभियानों के जरिए वे जलवायु न्याय और टिकाऊ विकास की आवाज बुलंद कर रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई युवा मानसिक तनाव और ‘इको-एंग्जायटी’ का सामना कर रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, यदि समय रहते प्रभावी नीतियां लागू नहीं की गईं तो आने वाले वर्षों में यह असंतोष बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है। ऐसे में नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती है कि वे युवाओं के विश्वास को बनाए रखते हुए जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ठोस रणनीति पेश करें।


