फिल्म O Romeo में निर्देशक Vishal Bhardwaj ने एक बार फिर अपने विशिष्ट अंदाज में प्रेम, हिंसा और भावनाओं का संगम पेश करने की कोशिश की है। कहानी एक ऐसे किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो ‘उस्तरा’ जैसी खुरदुरी पहचान से निकलकर ‘रोमियो’ बनने की राह पर चलता है। हालांकि फिल्म की पटकथा और गति कुछ जगहों पर कमजोर पड़ती नजर आती है, जिससे भावनात्मक प्रभाव पूरी तरह नहीं बन पाता।
फिल्म में Shahid Kapoor ने अपने किरदार में तीव्रता और संवेदनशीलता दोनों को पकड़ने की कोशिश की है, लेकिन इस बार उनका अभिनय उतना प्रभावशाली नहीं दिखता जितनी उम्मीद की जा रही थी। इसके उलट अविनाश और Nana Patekar ने अपनी सशक्त स्क्रीन प्रेजेंस से कई दृश्यों में बाजी मार ली। खासकर नाना का संवाद अदायगी और बॉडी लैंग्वेज दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ती है।
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संगीत और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की मजबूती हैं, जो माहौल को गहराई देते हैं। कुल मिलाकर ‘O Romeo’ एक महत्वाकांक्षी प्रयास है, जिसमें दमदार अभिनय और दिलचस्प विचार तो हैं, लेकिन कसावट की कमी इसे उत्कृष्ट बनने से रोकती है। विशाल भारद्वाज की शैली के प्रशंसकों के लिए यह फिल्म देखने लायक है, मगर यह उनकी सर्वश्रेष्ठ कृतियों में शामिल नहीं हो पाती।


