भारत में जनगणना (Census of India) देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया मानी जाती है। लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर जनगणना को लेकर चर्चा तेज है—यह कैसे होगी, जाति जनगणना से कितनी अलग है, और आखिरी बार कब कराई गई थी। यहां इन सभी सवालों के जवाब सरल भाषा में दिए जा रहे हैं।
इस बार जनगणना को डिजिटल और हाइब्रिड मॉडल पर कराने की तैयारी है। इसमें परंपरागत घर-घर सर्वे के साथ-साथ मोबाइल ऐप और टैबलेट के जरिए डेटा संग्रह किया जाएगा। नागरिकों को स्व-गणना (Self Enumeration) का विकल्प भी मिल सकता है, जिससे वे खुद ऑनलाइन अपनी जानकारी दर्ज कर सकें।जनगणना आमतौर पर दो चरणों में होती है—हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना: घरों की स्थिति, सुविधाएं (पानी, शौचालय, बिजली आदि)।जनसंख्या गणना: उम्र, लिंग, शिक्षा, रोजगार, भाषा जैसी सामाजिक-आर्थिक जानकारियां।
मुख्य जनगणना का फोकस पूरी आबादी की बुनियादी सामाजिक-आर्थिक तस्वीर पर होता है, जबकि जाति जनगणना विशेष रूप से अलग-अलग जातियों की संख्या और स्थिति का आकलन करती है।मुख्य जनगणना में SC/ST की गणना होती है।OBC और अन्य जातियों का विस्तृत डेटा मुख्य जनगणना में परंपरागत रूप से शामिल नहीं रहा है।जाति जनगणना का उद्देश्य नीतियों, आरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े निर्णयों के लिए सूक्ष्म जातिगत डेटा उपलब्ध कराना होता है।इसी कारण दोनों प्रक्रियाएं उद्देश्य और दायरे में अलग मानी जाती हैं।
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भारत में आखिरी जनगणना 2011 में कराई गई थी। इसके बाद 2021 में जनगणना प्रस्तावित थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण यह टल गई।वहीं, सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) आखिरी बार 2011 में ही कराई गई थी, जो मुख्य जनगणना से अलग प्रक्रिया थी।जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही—सरकारी योजनाएं बनती हैं, संसाधनों का वितरण होता है, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन तय होता है, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार नीतियों को दिशा मिलती है।


