पाकिस्तान की सियासत एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में प्रवेश कर चुकी है। देश के आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर के कार्यकाल विस्तार को लेकर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार और सेना के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। यह मुद्दा न केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को झकझोर रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी देश की स्थिरता को लेकर सवाल खड़े कर रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, असीम मुनीर का कार्यकाल अगले कुछ महीनों में समाप्त होने वाला है। ऐसे में सरकार की तरफ से उनके विस्तार को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई है। वहीं, आर्मी के शीर्ष हलकों में माना जा रहा है कि मौजूदा सुरक्षा हालात को देखते हुए मुनीर को कुछ समय और पद पर बने रहना चाहिए। लेकिन इस पर शहबाज सरकार के भीतर मतभेद उभर आए हैं।
शहबाज सरकार में बढ़ा दबाव
शहबाज शरीफ की सरकार पहले ही आर्थिक संकट, महंगाई और जनता के असंतोष का सामना कर रही है। ऐसे में सेना के साथ टकराव उनके लिए राजनीतिक जोखिम साबित हो सकता है। पाकिस्तान की राजनीति में सेना का प्रभाव हमेशा से निर्णायक रहा है, और ऐसे में आर्मी चीफ के मुद्दे पर मतभेद पैदा होना सरकार की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।
सूत्र बताते हैं कि पीएम शहबाज, असीम मुनीर के कार्यकाल को बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि सेना में नए नेतृत्व को मौका देना चाहिए। वहीं, सेना की तरफ से यह दलील दी जा रही है कि वर्तमान सुरक्षा हालात — खासकर अफगान सीमा पर बढ़ती आतंकवादी गतिविधियों — को देखते हुए मौजूदा नेतृत्व को बदलना ठीक नहीं होगा।
अंदरूनी राजनीति और विपक्ष की भूमिका
इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) पार्टी इस पूरे मुद्दे पर सरकार को घेरने में जुटी है। PTI नेताओं का कहना है कि शहबाज सरकार सेना के दबाव में काम कर रही है और उसके पास स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता नहीं है।
दूसरी ओर, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि असीम मुनीर और इमरान खान के बीच पुराने मतभेद इस विवाद की जड़ में हैं। मुनीर ने अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही कई राजनीतिक हस्तियों पर कार्रवाई कराई थी, जिससे सत्ता गलियारों में तनाव बढ़ गया था।
सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर असर
पाकिस्तान इस समय कई मोर्चों पर चुनौतियों से जूझ रहा है — आर्थिक संकट, महंगाई, बिजली की कमी और IMF की सख्त शर्तें। ऐसे में अगर सेना और सरकार के बीच तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर निवेश माहौल और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि असीम मुनीर को विस्तार नहीं दिया गया, तो सेना में आंतरिक असंतोष बढ़ सकता है। वहीं अगर विस्तार दिया गया, तो विपक्ष इसे “संविधान के खिलाफ कदम” बताकर सियासी मुद्दा बना सकता है।
अंतरराष्ट्रीय नजरें भी पाकिस्तान पर
अमेरिका, चीन और खाड़ी देशों की नजर भी पाकिस्तान की इस राजनीतिक उठापटक पर है। असीम मुनीर का कार्यकाल विस्तार या नई नियुक्ति, पाकिस्तान की विदेश नीति की दिशा तय कर सकता है।
खासकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) और अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर सेना का रुख निर्णायक होता है। ऐसे में यह टकराव सिर्फ आंतरिक मामला नहीं, बल्कि वैश्विक असर वाला मुद्दा बन गया है
आने वाले हफ्ते होंगे अहम
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले कुछ हफ्ते पाकिस्तान की राजनीति के लिए निर्णायक साबित होंगे। अगर शहबाज सरकार और सेना के बीच समझौता नहीं हुआ, तो इस्लामाबाद में सत्ता संकट गहराने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
पाकिस्तान के इतिहास में कई बार देखा गया है कि जब भी सरकार और सेना के बीच टकराव बढ़ा है, देश ने राजनीतिक अस्थिरता और शासन संकट का सामना किया है। इस बार भी स्थिति कुछ वैसी ही दिख रही है।





