2022 से 2026 के बीच 111 जनप्रतिनिधियों ने बदली पार्टी, नागालैंड और बंगाल में सबसे ज्यादा दल-बदल; जानिए क्या कहते हैं आंकड़े
नई दिल्ली: चुनाव जीतने के बाद किसी जनप्रतिनिधि का राजनीतिक दल बदलना भारतीय राजनीति में लंबे समय से बहस का विषय रहा है। अब एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच के ताजा विश्लेषण ने इस बहस को आंकड़ों का आधार दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2022 से 2026 के बीच 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद अपना राजनीतिक दल बदला। रिपोर्ट 24 सितंबर 2026 को जारी की गई।
इस संख्या में 78 विधायक, 26 लोकसभा सांसद और 7 राज्यसभा सांसद शामिल हैं। ADR ने लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं के मौजूदा सदस्यों के साथ संबंधित उपचुनावों में हुए राजनीतिक बदलावों का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि उपलब्ध आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर तैयार सूची पूरी तरह संपूर्ण होने की गारंटी नहीं है, क्योंकि दल-बदल का कोई एकीकृत आधिकारिक डेटाबेस व्यवस्थित रूप से उपलब्ध नहीं है।
आंकड़ों में सबसे बड़ा हिस्सा विधायकों का
111 मामलों में विधानसभा सदस्यों की संख्या सबसे अधिक है। इसका सीधा अर्थ यह है कि दल-बदल का असर केवल संसद की राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य सरकारों के गठन और विधानसभा के संख्याबल पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
ADR के विश्लेषण में दल बदलने की घटनाओं को अलग-अलग परिस्थितियों में देखा गया है। इनमें व्यक्तिगत रूप से पार्टी बदलना, पार्टी का विलय, इस्तीफा देने के बाद उपचुनाव जीतना और अयोग्यता के बाद दोबारा चुनाव जीतना जैसी स्थितियां शामिल हैं। इसलिए हर मामला एक जैसा राजनीतिक या कानूनी घटनाक्रम नहीं है।
नागालैंड में सबसे ज्यादा बदलाव
राज्यवार आंकड़ों में नागालैंड 32 मामलों के साथ सबसे ऊपर रहा। यह कुल 111 मामलों का लगभग 29 प्रतिशत है। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20 मामले सामने आए। तेलंगाना में 9, जबकि गोवा और पंजाब में 8-8 मामलों का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है।
नागालैंड का आंकड़ा विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ADR के अनुसार अक्टूबर 2025 में नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) के नागा पीपुल्स फ्रंट (NPF) में विलय से जुड़े घटनाक्रम का इस संख्या पर बड़ा असर पड़ा। यानी राज्यवार आंकड़ों को समझते समय केवल व्यक्तिगत नेताओं के पार्टी बदलने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है; संगठनात्मक विलय भी तस्वीर को प्रभावित करते हैं।
किन दलों से सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि बाहर गए?
रिपोर्ट में पार्टीवार तस्वीर भी सामने आई है। सबसे अधिक जनप्रतिनिधियों के पार्टी छोड़ने का आंकड़ा NDPP के लिए 25 है। इसके बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) के 20 और कांग्रेस के 19 जनप्रतिनिधियों ने पार्टी बदली।
इसके अलावा BRS से 9, AAP और NCP से 7-7, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) से 6, JD(U) से 5 और NPP से 4 जनप्रतिनिधियों के पार्टी बदलने का आंकड़ा रिपोर्ट में दिया गया है। NDPP, AITC और कांग्रेस के मामले मिलाकर 64 जनप्रतिनिधि बनते हैं, जो कुल 111 मामलों का लगभग 58 प्रतिशत है।
दूसरी तरफ इन दलों को मिले नए जनप्रतिनिधि
दल-बदल की कहानी का दूसरा पहलू उन राजनीतिक दलों का है, जिन्होंने दूसरे दलों से आए जनप्रतिनिधियों को अपने साथ जोड़ा।
ADR के अनुसार NPF ने 32, BJP ने 29 और NCPI ने 20 ऐसे जनप्रतिनिधियों को अपने साथ लिया। इन तीनों दलों को मिलाकर 81 जनप्रतिनिधि हुए, यानी कुल 111 मामलों का लगभग 73 प्रतिशत।
इस आंकड़े से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—दल-बदल केवल नेताओं के व्यक्तिगत राजनीतिक फैसलों का मामला नहीं है। इसका असर दलों की विधानसभा और संसद में संख्या, सरकारों के बहुमत तथा विपक्ष की ताकत पर भी पड़ सकता है।
दल-बदल कानून फिर चर्चा में क्यों?
भारत में दल-बदल को नियंत्रित करने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था है। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के पार्टी बदलने से पैदा होने वाली राजनीतिक अस्थिरता को रोकना है। लेकिन व्यवहार में किसी मामले में अयोग्यता लागू होगी या नहीं, यह परिस्थितियों और संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर निर्भर करता है।
ADR ने अपनी रिपोर्ट में दलबदल से जुड़े मौजूदा तंत्र में सुधार के कई सुझाव भी रखे हैं। इनमें सांसदों की अयोग्यता संबंधी निर्णय राष्ट्रपति और विधायकों के मामले में राज्यपाल द्वारा, निर्वाचन आयोग की सलाह के आधार पर किए जाने का प्रस्ताव शामिल है। संस्था ने अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निर्णय के लिए समयसीमा और दल बदलने वाले विधायकों के सार्वजनिक पद संभालने से जुड़े प्रतिबंध जैसे सुझाव भी दिए हैं।
हालांकि इन सुझावों को लागू करना विधायी और संवैधानिक प्रक्रिया का विषय है। इसलिए रिपोर्ट के सुझावों को मौजूदा कानून में बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी सुधार के प्रस्ताव के रूप में देखना चाहिए।
असली सवाल केवल संख्या का नहीं, जवाबदेही का है
111 जनप्रतिनिधियों का आंकड़ा अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक तथ्य है, लेकिन इसका लोकतांत्रिक महत्व समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि किसी प्रतिनिधि ने पार्टी क्यों बदली, उसके बाद उसकी सदस्यता की कानूनी स्थिति क्या रही और मतदाताओं ने बाद के चुनाव या उपचुनाव में उस बदलाव पर क्या प्रतिक्रिया दी।
एक विधायक या सांसद केवल व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान के आधार पर नहीं चुना जाता। चुनाव में पार्टी का चुनाव चिह्न, उम्मीदवार की पहचान, स्थानीय मुद्दे और पार्टी का घोषणापत्र—सभी मतदाता के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में चुनाव के बाद राजनीतिक दल बदलने पर प्रतिनिधि की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मतदाता के जनादेश के बीच संतुलन का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर, राजनीति में परिस्थितियां बदलती हैं और दलों के भीतर मतभेद, गठबंधन, विलय या संगठनात्मक पुनर्गठन भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं। इसलिए प्रत्येक दल-बदल को एक ही नजरिए से देखना भी आंकड़ों की सही व्याख्या नहीं होगी।
आगे क्या बदलेगा?
ADR के ताजा आंकड़े इस बहस को फिर सामने लाते हैं कि भारत के दलबदल विरोधी कानून को किस तरह अधिक स्पष्ट, समयबद्ध और जवाबदेह बनाया जाए। यदि भविष्य में अयोग्यता संबंधी मामलों के लिए स्पष्ट समयसीमा और निर्णय प्रक्रिया तय होती है, तो राजनीतिक दलों तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों दोनों के लिए नियमों की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।



